बख्शी जी की स्मृतियों को संजोने खैरागढ़ के इतिहास में पहली बार होगा ओपन स्पेस संगोष्ठी

डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

सीजी क्रांति न्यूज/खैरागढ़। देश के नामी हिंदी साहित्यकार डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की स्मृतियों को संजोने उनकी याद में 28 दिसंबर को संगोष्ठी आयोजित की जाएगी। खैरागढ़ के इतिहास में सभवतः ऐसा पहली बार होगा कि अंबेडकर चौक में खुले आसमान के नीचे सार्वजनिक रूप से बख्शी जी की याद में उनके कृत्तिव और व्यक्तित्व पर संगोष्ठी आयोजित की जाएगी। इकरा फाउंडेशन, नगर के प्रबुद्धजन और सामाजिक चिंतक इसकी तैयारियों में जुटे हैं।

बता दें कि डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म अविभाजित राजनांदगांव के छोटे से कस्‍बे खैरागढ़ में 27 मई 1894 में हुआ। उनका निधन 28 दिसंबर 1971 को हुआ। उनके पिता पुन्नालाल बख्शी खैरागढ़ के प्रतिष्ठित परिवार से थे। उनकी प्राथमिक शिक्षा विक्‍टोरिया हाई स्‍कूल खैरागढ में हुई थी। प्रतिभावान बख्‍शी जी ने बनारस हिन्‍दू कॉलेज से बी.ए. किया।

हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा सन् 1949 में साहित्य वाचस्पति की उपाधि से अलंकृत किया गया। इसके ठीक एक साल बाद वे मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति निर्वाचित हुए। 1951 में डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी की अध्यक्षता में जबलपुर में मास्टर जी का सार्वजनिक अभिनंदन किया गया। 1969 में सागर विश्वविद्यालय से द्वारिका प्रसाद मिश्र (मुख्यमंत्री) द्वारा डी-लिट् की उपाधि से विभूषित किया गया।

डॉ. पदुमलाल पन्नालाल बख्शी ने अध्यापन, संपादन लेखन के क्षेत्र में व्यापक कार्य किए। उन्होंने कविताएं कहानियां और निबंध सभी कुछ लिखा हैं पर उनकी ख्याति विशेष रूप से निबंधों के लिए ही है। उनका पहला निबंध ‘सोना निकालने वाली चींटियाँ’ सरस्वती में प्रकाशित हुआ था। उन्होंने राजनांदगांव के स्टेट हाई स्कूल में सर्वप्रथम 1916 से 1919 तक संस्कृत शिक्षक के रूप में सेवाएं दी।

दूसरी बार 1929 से 1949 तक खैरागढ़ विक्टोरिया हाई स्कूल में अंग्रेजी शिक्षक के रूप में कार्य किए। कुछ समय तक उन्होंने कांकेर में भी शिक्षक के रूप में काम किया। सन् 1920 में सरस्वती के सहायक संपादक के रूप में नियुक्त किये गये और एक वर्ष के भीतर ही 1921 में वे सरस्वती के प्रधान संपादक बनाये गये जहां वे अपने स्वेच्छा से त्यागपत्र देने (1925) तक उस पद पर बने रहे। 1927 में पुनः उन्हें सरस्वती के प्रधान संपादक के रूप में ससम्मान बुलाया गया।

दो साल के बाद उनका साधुमन वहां नहीं रम सका, उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने 1952 से 1956 तक महाकौशल के रविवारीय अंक का संपादन कार्य भी किया तथा 1955 से 1956 तक खैरागढ में रहकर ही सरस्वती का संपादन कार्य किया। तीसरी बार 20 अगस्त 1959 में दिग्विजय कॉलेज राजनांदगांव में हिंदी के प्रोफेसर बने और जीवन पर्यन्त वहीं शिक्षकीय कार्य करते रहे।

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