EXCLUSIVE…Khairagarh By Election: देवव्रत की मंझली बहन भी ठोकेंगी ताल? बड़े कांग्रेसी नेताओं के संपर्क में स्मृति!

DEVVRAT SINGH KE SATH CHHOTI BAHAN SMRITI SINGH

सीजी क्रांति/खैरागढ़। विधानसभा उपचुनाव को लेकर एक और बड़ी खबर आ रही है। कांग्रेसी की ओर से दावेदारी करने वालों की सूची में राजघराने से एक और नाम जुड़ गया है। सूत्र बताते है कि दिवंगत विधायक देवव्रत सिंह की मंझली बहन स्मृति सिंह भी चुनावी रण में बिगुल फूंक सकती है। स्मृति कांग्रेस के बड़े नेताओं के संपर्क में है। वह उपचुनाव में राजघराने के वर्चस्व को जिंदा रखने की मंशा जाहिर कर रही है। उन्होंने टीएस सिंहदेव और दिग्विजय सिंह जैसे बड़े कांग्रेसी नेताओं से मुलाकात भी कर ली है। वही कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से मिलने का इंतजार कर रही है। उसके बाद ही खुलकर मैदान में सामने आएंगी।

शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात के बाद फैसला

कांग्रेस की टिकट पर उपचुनाव लड़ने के लिए स्मृति सिंह ने पूरा मन बना लिया है। सूत्र बताते है कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात की भी योजना बना ली है। शीर्ष नेताओं से मुलाकात के बाद ही आगे की राह पर फैसला लिया जाएगा। क्योंकि राज्य नेतृत्व भी ऊपरी नेताओं का ही सुनेगा। ऐसे में ऊपरी नेताओं के माध्यम से एप्रोच लगाने की जुगत चल रही है।

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साल 2007 के उपचुनाव में भी थी पहली पसंद?

सीजी क्रांति से बातचीत के दौरान स्मृति सिंह ने उपचुनाव के लिए दावेदारी वाली बात पर तो खुलकर नहीं बोली, लेकिन उन्होंने राजघराने की राजनीतिक क्षेत्र से जुड़ी अपनी यादों को साझा किया। उन्होंने कहा कि जब दादा (देवव्रत) एमपी बने तो साल 2007 में उपचुनाव कराना पड़ा। उस दौरान भी उपचुनाव के लिए दादा की पहली पसंद मैं ही थी। लेकिन परिस्थितिवश टिकट नहीं मिल पाया। उन्होंने बताया कि साल 2018 के विधानसभा चुनाव में जब देवव्रत सिंह नयी पार्टी जोगी कांग्रेस से चुनावी मैदान में उतरे थे, तो उन्होंने प्रचार-प्रसार के लिए मैदान में उतरी थी।

कदम-कदम पर दादा का साथ दी

साल 2018 विधानसभा चुनाव के दौरान वोट की अपील करती स्मृति सिंह।

सीजी क्रांति से बातचीत में स्मृति सिंह ने बताया कि राजनीतिक क्षेत्र में देवव्रत सिंह का कदम-कदम साथ चलती रही है। उन्होंने खुलकर देवव्रत सिंह के सपोर्ट में काम किया है। उनकी माता रानी रश्मि देवी सिंह के असमय मृत्यु के बाद 1995 में देवव्रत को उपचुनाव लड़ना पड़ा था। स्मृति ने बताया कि जब दादा (देवव्रत) 25 वर्ष के थे, तब माता का निधन हो गया। उसके बाद राजघराने की राजनीतिक जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। तब उन्होंने देवव्रत के कदम से कदम मिलाकर चली। वही उपचुनाव में जीत के लिए जी तोड़ मेहनत भी की।

खैरागढ़ विधानसभा की वोटर है स्मृति

साल 2018 विधानसभा चुनाव के दौरान वोट देने के बाद बांये से उज्ज्वला सिंह, स्मृति सिंह, विभा सिंह और दिवंगत विधायक देवव्रत सिंह।

देवव्रत सिंह की मंझली बहन स्मृति सिंह का खैरागढ़ के मतदाता सूची में नाम है। वह विधानसभा चुनाव में खैरागढ़ से ही वोट करती है। यहां तक कि पिछले चुनाव में भी देवव्रत सिंह के साथ वोट डालने पहुंची थी। वही राजनीतिक क्षेत्र में भी स्मृति ने देवव्रत का हर कदम में साथ दिया है।

9 साल की उम्र में राजनीति से जुड़ी

सीजी क्रांति से खास बातचीत के दौरान स्मृति सिंह ने बताया कि महज 9 साल की उम्र में ही राजनीति क्षेत्र से नाम जुड़ गया था। उनकी मां रानी रश्मि देवी सिंह 1980 में पहली बार चुनावी मैदान में उतरी, तो स्मृति की उम्र 9 साल थी। तब से लेकर राजघराने से चुनावी मैदान में उतरने वाले प्रत्याशी के लिए वोट मांगती आ रही है। पिछले चुनाव में भी स्मृति सिंह ने देवव्रत सिंह के लिए वोट की अपील की थी।

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