कांवड़ यात्रा शिव भक्ति का अनूठा साधन – रामबालकदास

संत रामबालकदास

सीजी क्रांति/बालोद. श्रावण मास 25 जुलाई से प्रारंभ हो रहा है. शिव भक्तों में कांवड़ यात्रा को लेकर खासा उत्साह है. कांवड़ यात्रा का प्रचलन इतना विस्तृत रूप ले चुका है कि सावन में सड़कों पर कांवरिये ही कांवरिये नजर आते हैं. माना जाता है कि जलाभिषेक से भगवान शंकर बहुत प्रसन्न होते हैं तथा भक्तों को इच्छित फल देते हैं.


बालोद जिले के डौंडी लोहारा में स्थित पाटेश्वरधाम के आनलाईन सतसंग में पुरुषोत्तम अग्रवाल की जिज्ञासा कांवड़ यात्रा की शुरूआत किसने की, कब हुयी और इसका क्या महत्व है ? पर प्रकाश डालते हुये रामबालकदास ने बताया कि कावड़ यात्रा का शुभारंभ बाबा बैजनाथ धाम से शुरू हुआ है. बैजनाथ भोलेनाथ जी का ऐसा धाम है जो अपने आप स्थापित हुआ है. रावण जब कैलाश से भगवान शिव को लेकर लंका जा रहे थे तो रास्ते में विष्णु जी ने ब्राह्मण का रूप धारण कर लिया और जब रावण को तीव्र लघुशंका लगी तो उसने भगवान शिव की मूर्ति को ब्राह्मण (विष्णु जी) के हाथ में दे दिया और विष्णु भगवान ने उसे धरती पर स्थापित कर दिया। बाद में जब रावण ने शिवलिंग को उठाने का प्रयास किया तो वे उससे नहीं उठे तभी से भगवान वहीं पर स्थापित हो गए और एक बैजू नाम के भक्त ने उनका गाय के दूध से अभिषेक किया तब से वे बैजनाथ कहलाये. यहीं से कावड़ यात्रा प्रारंभ हुई इसका इतिहास संभवत: सौ – डेढ़ सौ साल पुराना है। रामधारी सिंह दिनकर की पुस्तक संस्कृति के 4 अध्याय में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है.


रामबालकदास ने कहा सावन के महिने में पवित्र नदियों का जल भरकर इसे कांवड़ यात्रा के माध्यम से शिव मंदिर तक की दूरी तय कर श्रद्धापूर्वक जलाभिषेक करते हैं. देश में कांवर यात्रा का प्रचलन अब काफी बढ़ गया है. भक्त जन लंबी दूरी की कांवड़ यात्रा करने लगे हैं. अनेक स्थानों पर दो सौ किमी, तीन सौ किमी या इससे भी अधिक दूरी कई दिनों तक पैदल चलकर शिव जी को जल अर्पित करते हैं। सैकड़ों की संख्या में विभिन्न दल एवं समूह केशरिया वस्त्र धारणकर, लोटे में जल भरकर, कांवर लेकर बाबा की जयकार करते हुये पैदल चलते हैं. कांवड़ यात्रा के संबंध में कुछ किवंदतियाॅ भी प्रचलित हैं. पहली किवंदति अनुसार भगवान परशुराम ने पुरा महादेव को प्रसन्न करने के लिये गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जल लेकर शिव जी का अभिषेक किया था। दूसरी किवदंति अनुसार श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता – पिता को कांवड़ में बिठाकर पैदल यात्रा कर गंगा स्नान करवाया और लौटते समय गंगा जल साथ लेकर आया जिससे शिव का अभिषेक किया. तीसरी किवदंति अनुसार समुद्र मंथन से निकले विष का पान करने से भगवान शिव का गला जलने लगा तब रावण ने उन्हें शीतलता प्रदान की.
रामबालकदास ने कहा कांवर यात्रा पूरे भक्ति भाव से होनी चाहिये. मन में शिव जी के प्रति अटूट आस्था एवं श्रद्धा होनी चाहिये. इसे मनोरंजन, सैर सपाटा आदि से नहीं जोड़ना चाहिये.

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