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0 तकनीक मौजूद, कानून मौजूद—फिर आरोपी क्यों नहीं?

0 भाजपा महिला नेत्री प्रकरण: मोबाइल नंबर ट्रेस क्यों नहीं कर पा रही पुलिस?

सीजी क्रांति न्यूज / राजनांदगांव
छत्तीसगढ़ के जिला केसीजी अंतर्गत छुईखदान क्षेत्र में एक भाजपा महिला नेत्री के अश्लील एडिटेड फोटो वायरल किए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। प्रकरण की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस ने भले ही गोपनीयता की ढाल ओढ़ रखी हो, लेकिन जांच की रफ्तार को लेकर आमजन के बीच कई सवाल खड़े हो रहे हैं। थानेदार से लेकर आईजी स्तर तक के अधिकारी खुलकर कुछ भी कहने से बच रहे हैं, जिससे मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं और अटकलें तेज हो गई हैं।

जानकारी के अनुसार, पीड़िता की शिकायत का परीक्षण करने के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। आरोप है कि अज्ञात व्यक्ति ने दो अलग-अलग मोबाइल नंबरों से महिला नेत्री और उनके पति को अश्लील रूप से एडिट की गई तस्वीरें भेजीं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आज के हाईटेक दौर में जब साइबर ट्रैकिंग के कई आधुनिक साधन उपलब्ध हैं, तब भी आरोपी तक पहुंचने में इतना समय क्यों लग रहा है?

 

जांच में देरी से बढ़ी कानाफूसी

मामले की जांच लंबी खिंचने से स्थानीय स्तर पर अफवाहों का दौर शुरू हो गया है। लोग आपस में यह जानने को उत्सुक हैं कि आखिर वह भाजपा महिला नेत्री कौन है। हालांकि कानूनन पीड़िता की पहचान उजागर नहीं की जा सकती, लेकिन स्पष्ट जानकारी के अभाव में अन्य महिला नेत्रियों को भी संदेह की नजर से देखा जाने लगा है।

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि जांच की धीमी रफ्तार से भाजपा की अन्य महिला पदाधिकारियों को असहज स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। सोशल मीडिया पर नाम उछालने और अपुष्ट दावे करने का सिलसिला भी जारी है।

पूर्व विधायक कोमल जंघेल का नाम घसीटा गया

इस मामले में सोशल मीडिया पर भाजपा के पूर्व विधायक कोमल जंघेल का नाम भी जोड़ा गया। हालांकि उन्होंने इन खबरों का खंडन करते हुए आरोपों को निराधार बताया है। उन्होंने संयमित प्रतिक्रिया दी है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े नेताओं की प्रतिष्ठा ऐसे मामलों में दांव पर होती है, ऐसे में स्पष्ट और सख्त स्थिति भी अपेक्षित होती है।

पुलिस जांच पर उठते सवाल

अब सवाल यह है कि—

  • क्या संबंधित मोबाइल नंबरों की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) निकाल ली गई है?
  • टेलीकॉम कंपनियों से केवाईसी जानकारी प्राप्त हुई या नहीं?
  • आईएमईआई ट्रैकिंग और टॉवर लोकेशन का विश्लेषण किया गया या नहीं?
  • साइबर सेल को कब और किस स्तर पर जोड़ा गया है?

आम तौर पर ऐसे मामलों में थाना या साइबर पुलिस टेलीकॉम कंपनियों को पत्र लिखकर कॉल डिटेल, केवाईसी और लोकेशन डेटा प्राप्त करती है। तकनीकी प्रक्रिया में एक दिन से लेकर अधिकतम 15 दिन तक का समय लग सकता है। ऐसे में यदि जांच अपेक्षित समयसीमा से आगे बढ़ रही है, तो इसके कारणों पर स्पष्टता जरूरी है।

आईजी स्तर पर जांच, पर समयसीमा अस्पष्ट

सूत्रों के अनुसार, मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच आईजी स्तर की निगरानी में की जा रही है। डीएसपी के नेतृत्व में पांच सदस्यीय टीम गठित किए जाने की चर्चा है। हालांकि, यह सार्वजनिक नहीं किया गया है कि टीम को जांच पूरी करने के लिए कोई समयसीमा निर्धारित की गई है या नहीं।

जिला स्तर के अधिकारी भी औपचारिक बयान देने से बच रहे हैं। इससे यह धारणा बन रही है कि या तो जांच बेहद जटिल है या फिर किसी कारणवश सूचना साझा करने में हिचकिचाहट है।

संवेदनशीलता बनाम पारदर्शिता

यह मामला महिला की गरिमा और साइबर अपराध से जुड़ा है, इसलिए गोपनीयता आवश्यक है। लेकिन गोपनीयता और पूर्ण चुप्पी के बीच संतुलन भी जरूरी है। मामला का खुलासा जल्द हो जाएं, आरोपी पुलिस की गिरफ्त में आ जाएं तो अफवाहों पर अंकुश लगाया जा सकता है!

फिलहाल, छुईखदान का यह हाई-प्रोफाइल मामला राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है। अब सबकी निगाहें पुलिस जांच की दिशा और रफ्तार पर टिकी हैं—क्या आरोपी जल्द पकड़ा जाएगा या यह मामला भी लंबी जांच की फाइलों में दब जाएगा?

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