श्री रुक्खड़ बाबा महोत्सव: महाशिवरात्रि पर सिद्धपीठ में द्वादश ज्योतिर्लिंग पूजन का है विशेष महत्व 

श्री रुक्खड़ बाबा महोत्सव

CG क्रांति/खैरागढ़। महाशिवरात्रि पर्व पर तपस्वी संत रुक्खड़ बाबा का दरबार एक बार फिर सजने वाला है। बाबा के तप से खैरा (चकनार) में अवतरित माँ नर्मदा के जल को लेकर शिव भक्तों द्वारा शनिवार को पदयात्रा करते हुए खैरागढ़ पहुंचें। खैरा से जल लेकर निकले कांवरियों का जगह-जगह स्वागत किया गया। खैरा में सांसद संतोष पांडेय ने आयोजन में शामिल होकर कांवर लेकर चले। उन्होंने लोगों की भक्ति को चार गुनी करने का काम किया। सुबह खैरा निकली कांवर यात्रा दोपहर तक खैरागढ़ पहुंची। जहां उसे विधिविधान के साथ मंदिर में रखा गया। वही इसी जल से सिद्ध पीठ में स्थित भगवान भोलेनाथ की पूजा पूर्व जलाभिषेक करेंगें।

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27 फरवरी को मंदिर परिसर में रामायण मंडलियों को सम्मानित किया जाएगा। 28 फरवरी को मंत्रोच्चार के बीच पार्थिव शिव लिंग और गण निर्माण होगा। 01 मार्च को महाशिवरात्रि के दिन द्वादश ज्योतिर्लिंगों का विधि विधान से पूजन होगा। इसी दिन शाम को भव्य शोभायात्रा परंपरा नुसार शुरू होगी जो नगर भ्रमण करते हुए श्री वीरेश्वर महादेव मंदिर पहुंचेंगी।

मंगलवार और महाशिवरात्रि का पर्व एक साथ पड़ने की वजह धर्मयात्रा के सोलहवें पड़ाव में  से रात्रि 8 बजे से अति प्राचीन हनुमान मंदिर में सुंदरकांड के सामूहिक पाठ का कार्यक्रम रखा गया है। 02 मार्च को विशाल भंडारे के साथ आयोजन का समापन होगा। ट्रस्ट के अध्यक्ष रामकुमार सिंह ने बताया कि आयोजन का यह तीसरा वर्ष है,जिसमें लोगों की आस्था लगातार बढ़ रही है। तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। कार्यक्रम के दौरान कोरोना प्रोटोकॉल का पालन किया जाएगा।

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सिद्धपीठ श्री रुक्खड़ स्वामी मंदिर में क्यों फलदायी है द्वादश ज्योतिर्लिंगों की पूजा

सिद्ध पीठ के पुरोहित आचार्य भूपेंद्र दुबे व आचार्य धर्मेंद्र दुबे ने बताया कि सृष्टि का संचार ( पालन पोषण निर्माण संहार ) शिव से संचालित है। यह द्वादश ज्योतिर्लिंग पुरे विश्व ब्रम्हांड के 12 मुल आधार स्तम्भ ( नीव ) है। और जहाँ तक हम सभी को पता है,नीव मजबूत हो तो गृह मज़बूत माना जाता है।

वैसे ही हमारे शरीर रूपी गृह को मजबूती व जीवन को मजबूती मंगलमय प्रदान करने हेतु हम सभी के तपस्वी संत श्री रुक्खड़ स्वामी बाबा सिद्धपीठ मंदिर प्रांगण में महान पुण्यतम दिवस महाशिवरात्रि के अवसर पर द्वादश ज्योतिर्लिंग पुनम अर्चन वंदन नमन लाभ हम सभी एक साथ ले सकेगे। वो भी हमारे सिद्ध पीठ में। यह दिवस अपने आप मे गरिमामयी,प्रदायिनी,सुखकारी एवं मंगल मय जीवन श्रेष्ठ नव ग्रह दोष सर्व बाधा संतति प्रदायक,विद्याप्रदायक,सर्वार्थ कामना प्रदायक है । 

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सिद्धपीठ में फलदायी है पूजा

आचार्य दुबे ने बताया कि यह अर्चन २०० % फलदायी है। यह कार्य एक क्योकि यह सत्कर्म योगी द्वार सिद्ध पीठ मे सम्पन्न होगा। 269 पौराणिक हैं , देवालय है । फलकारी तो गृह मे भी है लेकिन एक सिद्ध शक्तिपीठ में यह कार्य सम्पन्न होने से एक गुणकारी फलप्रदायिनी होगा और यह अर्चन आपको दुगुना अधिक फल प्राप्त कराएगा। जैसे कि एक वृक्ष में आप ही आप पक हमे कही वही फल को ताडकर स्वयं पका के स्वाद,हुये फल का स्वाद दोगुना अधिक होता है और वही चखना चाहे तो वह फल का मिठास कम हो जाता है। 

सोलहवें पड़ाव में प्राचीन हनुमान मंदिर में होगा सामूहिक सुंदरकांड का पाठ

सिद्ध शक्ति पीठ मे पुजन वो भी द्वादश ज्योतिलिंग और साथ ही साथ आप सभी को सुन्दर कांड पाठ करने का भी लाभ प्राप्त होगा। जो कि शिवजी के एकादश स्वरूपो मे एक रूप उनका भी है। यह सुन्दरकांड , यथा नाम तथा गुण है। जिन महानुभाव को अपने जीवन सुन्दरता की ओर अग्रसर करना एवं शिव- हनुमान कृपा पात्र बनना,निरन्तर बने रहना है, सुंदरकांड पाठ सोलहवें पड़ाव से आरंभ कर ल सकता है।

प्रांगण भाग ले के अतएब – शिव ( ब्रम्हा ) पुरे ब्रम्ह्मांड के अंगत पिता है और यही हमें सभी स्वरूपों में प्राप्त है और इसी को ध्यान मे रखते हुये, यही शिर्वाचन हमें शिव सिध्दशक्ति पीठ योगी श्री रुक्खड़ स्वामी मंदिर प्राप्त होगी अत : -ज्यादा से ज्यादा मे अपने जीवन को आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर करे। एवं दुखमुक्त होकर सर्वे भवन्तु सुखिनः का भाव लेकर केल सुख युक्त जीवन व्यतीत करे और यह शिर्वाचन 7 वैदिक आचार्यों द्वारा बड़े ही सुन्दर तरीके से सुलभता पूर्वक सादर सम्पन्न होगा।

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विल्व वृक्ष के नीचे पूजा महत्व

ऐसे विल्बवृक्ष जिनका अनन्त फलादेश शिवपुराण मे उल्लेख मिलता है। जिनके मूल मे ब्रम्हा मध्य मे विष्णु अग्रभाग मे शिव जी का वास नित्य है। विल्व वृक्ष दर्शन कर लेने शिवस्वरूप दर्शन सर्वपुण्य प्राप्त हो जाता है। विल्ववृक्ष का दर्शन साक्षांत शिव स्वरूप दर्शन स्पर्श से सूर्व पाप् का नाश हो जाता है। और विश्ववृक्ष के नीचे या उनके छाया या सानिध्य मे शिवाचन अघोर पाप नाशक है।

1753 में ख़ैरागढ़ आए रुक्खड़ बाबा

संवत 1812 में नागवंशी शासक खड़गराय ने पिपरिया,आमनेर और मुस्का के मध्य में एक नवीन नगर बसाया,जिसे पहले खड़गगढ़ कहा गया। पर बाद में चहुं ओर खैर वृक्षों की अधिकता की वजह से इसे खैर गढ़ कहा जाने लगा। जिसका अप भ्रंश होते – होते इसका नाम ख़ैरागढ़ पड़ा।

इनके बाद संवत 1816 ( सन 1753) ई. में टिकैतराय ख़ैरागढ़ के सिहांसन पर आरूढ़ हुए। टिकैतराय के शासनकाल में ही सर्वप्रथम रुक्खड़ बाबा का खैर के वन में आगमन हुआ। तब यहाँ आमजनों का रहवास नहीं था। बाबा ने वनों से आच्छादित इस स्थल को ही अपना ठिकाना बनाया। और सिद्धपीठ की स्थापना की। सन 1845 में राजा उमराव सिंह के शासन में पीठ में लकड़ियों के सहारे एक मंदिर का निर्माण किया गया। बाद में ट्रस्ट ने कांक्रीट करण कर वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया। इस तरह पीठ 269 सालों से विराजमान है। 

भव्य मंदिर निर्माण का है लक्ष्य

वर्तमान ट्रस्ट समिति ने अपनी गत बैठक में भव्य मंदिर निर्माण का निर्णय लिया है। जिसकी प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है। और एक भव्य मंदिर निर्माण की कार्ययोजना पर कार्यारंभ कर दिया गया है। चूंकि श्री रुक्खड़ स्वामी बाबा एक स्वयं सिद्ध तपस्वी थे। जिन पर क्षेत्र के लोगों की अगाध आस्था है। तो जन सहयोग व जन भागीदारी से इस मंदिर के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है जो आने वाले कई वर्षों के लिए होगा।

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