बड़ी खबर: झीरम रिपोर्ट पर अमित जोगी की मुख्यमंत्री को चुनौती

झीरम रिपोर्ट पर अमित जोगी की मुख्यमंत्री को चुनौती
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सीजी क्रांति/रायपुर। झीरम मामले में बड़ा बयान देते हुए जनता काँग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी ने कहा झीरम घाटी नरसंहार भारत के लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला रहा हैं। अत्यंत दुख कि बात है कि घटना के तत्काल बाद कुछ निम्नस्तरीय सोच रखने वाले कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने अपनी राजनैतिक रोटिया सेकने के लिए मेरे स्व पिता अजीत जोगी जी और मेरा नाम इस मामले में घसीटने का हर संभव प्रयास किया।

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उन्होंने कहा हिटलर के प्रचार-प्रसार मंत्री जोसफ गिबेल्स के कथन कीं ‘किसी झूठ का अगर 100 बार बोले तो वो सच बन जाता है’ का अनुसरण करते हुए उनकी इस निराधार और बेतुके आरोप को जन्ममानस ने स्वीकार भी बहुत हद तक किया । मुझे अच्छी तरह याद है कि मेरे पिताजी ने उस समय कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष से दुरभाष कर रोते-रोते आग्रह किया था इस घटना के बाद प्रदेश का कोई भी कांग्रेसी सुरक्षीत नहीं है इसलिए भाजपा शासित प्रदेश में संविधान की धारा 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन तत्काल लागू किया जाए। सोनिया जी ने इस बात पर अपनी सहमति भी जाहिर करी किन्तु श्री राहुल गांधी के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने इस सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया।

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इसका एक बड़ा कारण श्री बी.के. हरिप्रदास एवं श्री भूपेश बघेल की साठ-गाठ में मेरे पिताजी और मेरे विरूद्ध राजनैतिक हत्या करने के उद्देश्य से चलाया जा रहा सुनियोजित अभियान था। इस षडयंत्र के अंतर्गत झीरम घाटी नरसंहार से संबंधीत सभी नेता और परिजनों को यह निर्देश दिये जा रहे थे कि श्री राहुल गांधी के समक्ष सीधे तौर पर यह झूठा आरोप लगाया जाए कि इस नरसंहार के पीछे सीधे-सीधे मेरे पिताजी, मेरा और नक्सलियों के बीच की राजनैतिक साजिश है।

जब स्वर्गीय श्री नंदकुमार पटेल की शहादत के बाद भूपेश बघेल प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष बने तब उन्होंने अपनी प्रथम प्रेसवार्ता में स्पष्ट रूप से कहा कि झीरम घाटी नरसंहार एक राजनैतिक षड्यंत्र था। यही नही उन्होंने यह भी कहा था कि इस कथाचित राजनैतिक षड्यंत्र का प्रमाण उनकी जेब में है। झीरम घाटी नरसंहार घटानाक्रम की जांच हेतु केन्द्र शासित कांग्रेस सरकार ने उसकी संपूर्ण जांच NIA को सौंप दी थी। भाजपा शासित राज्य सरकार ने इस प्ररकण की जांच छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री प्रशांत मिश्रा के नेतृत्व में जांच आयोग का गठन भी किया। कांग्रेस द्वारा गठित NIA की जांच रिर्पोट में कही पर भी ना तो मेरे पिताजी और ना ही मेरा उल्लेख आया है। भाजपा द्वारा गठित जांच आयोग की रिर्पोट हाल ही में महामहिम राज्यपाल को सौंपी गई है। उस रिर्पोट पर भी हमारा उल्लेख नही है।

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जब 2018 में भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने हम दोनों का नाम इस मामले में घसीटने के उद्देश्य से SIT का भी गठन करने का आदेश पारित कर दिया किन्तु माननीय न्यायालय ने इस SIT कि कार्यवाही पर भी राजनैतिक द्वेष की संभावना को देखते हुए रोक लगा दी। माननीय उच्च न्यायालय के इस निर्णय का समर्थन सर्वोच्च न्यायालय ने भी किया।

*झीरम घाटी नरसंहार के 8 साल बाद अंततः जस्टिस प्रशांत मिश्रा आयोग की रिर्पोट राज्यपाल को सौंपी गई। मुझे कहने में कोई संकोच नही है कि असामान्य स्थिति है क्योकि राज्य शासन द्वारा गठित न्यायिक जांच आयोग सामान्य रूप से मंत्रीमंडल न की राज्यपाल को सौंपी जाती है। अगर हमारे प्रदेश के सबसे वरिष्ठ एवं विद्वान न्यायिक अधिकारी ने इस परंपरा के विपरीत जाकर अपनी रिर्पोट सीधे राज्यपाल को सौंपी है, तो इसका एक ही निष्कर्ष निकल सकता है कि आयोग को अपनी रिर्पोट के निष्कर्षो पर कार्यवाही करने हेतु राज्य मंत्रीमंडल में भरोसा नहीं है। इस निष्कर्ष पर वे क्यों और कैसे पहुंचे, उनकी 4617 पन्ने की रिर्पोट का अध्ययन करके ही ज्ञात होगा।

एक बात तो स्पष्ट है कि भूपेश सरकार ना तो NIA और ना ही मिश्रा जांच आयोग की रिर्पोट से संतुष्ट है। इसका प्रमुख और एक मात्र कारण एक ही दिखता है कि दोनों रीपोर्टों ने उनकी इस मनगणत बात का समर्थन नही किया है कि झीरम घाटी नरसंहार राजनैतिक संयंत्र था क्योंकि श्री भूपेश बघेल इसी काल्पनिक और झूठे आरोप को कांग्रेस आलाकमान को भरोसा जताने की बुनियाद से सत्ता में आसीन हुए है।

ऐसे में 8 साल बाद भूपेश सरकार पर फिर से NIA, मिश्रा जांच आयोग और SIT के निष्कर्ष को बीना देखे, उनके सामूहिक निष्कर्ष का सिरे से बीना तर्क खारिज करना एक अत्यंत ही संवेदनशील एवं हृदयविदारण घटना का अपने स्वार्थ के लिए राजनीतिकरण करने के अलावा और कुछ भी नही है। भूपेश बघेल जी के पास अगर सबूत है जिसे वे पिछले 8 वर्षो से अपनी जेब में छुपाकर रखे हैं, तो प्रथम दृष्टिया से स्वंय ही भारतीय दण्डसहिता की धारा 194, 201, 206, के अंतर्गत अपराधी है।

अगर भूपेश बघेल जी की जेब में उनके पास कोई सबूत है तो उसे तत्काल सार्वजनिक करें अन्यथा “मरे हुए घोड़े को कोड़े मारना बंद करें” और सार्वजनिक रूप से मेरे स्वर्गीय पिताजी और मुझसे क्षमा याचना करें क्योंकि मेरे पिता जी के सम्मान के बढ़कर मेरे लिए कुछ भी नहीं है।

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