बड़ी खबर : आखिर कब और कौन सुनेगा कटेमा के आदिवासियों का दर्द ! ग्राउंड रिपोर्ट

कटेमा के आदिवासी
कटेमा के आदिवासी

00 कटेमा के आदिवासियों तक सरकारी योजनाएं, नेता, अफसर कोई नहीं पहुँचता

00 घर मे बिजली नहीं, बच्चों को शिक्षा नहीं, बीमार का ईलाज नहीं

सीजी क्रांति/खैरागढ़. राजनांदगांव जिले के अंतिम छोर पर बसा वन ग्राम कटेमा यूं तो छत्तीसगढ़ राज्य का हिस्सा है लेकिन यहाँ के आदिवासी शिक्षा, स्वास्थ्य् जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के लिये पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र पर ही निर्भर है.
छत्तीसगढ़ के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक वन ग्राम कटेमा तक का सफर रोमांच और खतरों से भरा है. हरे-भरे घने जंगल, नदी, नाले, पहाड़ जहां इस यात्रा को यादगार बनाती है वहीं दुर्गम रास्ते गंतव्य तक पहुंचते-पहुंचते बेहाल कर देते हैं.

कटेमा पहुंच मार्ग की दयनीय स्थिति
कटेमा पहुंच मार्ग की दयनीय स्थिति

वन ग्राम कटेमा में प्रवेश करते ही बांस, घांस-फूस और मिट्टी से बनी झोपड़ियों से झाँकती डरी-सहमी नजरें यहाँ के आदिवासियों और आधुनिक दुनिया के विकास के बीच की दूरी को बयां करती है. यहां रहने वाले आदिवासियों की जिंदगी अत्यंत कठिन है और इनके रास्ते बहुत दुर्गम.

तेल, नमक से लेकर ईलाज के लिये महाराष्ट्र पर निर्भर

ग्राम कटेमा के आदिवासी परिवार अपनी दैनिक जरूरतों के सामान, खाद-बीज, ईलाज, शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये महाराष्ट्र पर ही निर्भर है. ग्रामीण रामसिंह कुरसेंगे ने बताया तेल, नमक, शक्कर जैसी चीज के लिये भी हम लोगों को घने जंगल के रास्ते महाराष्ट्र के गोंदिया जिले के मुरकुडीह, दलदलकुई, धनेगांव जाना पड़ता है.

कटेमा के आदिवासी परिवार
कटेमा के आदिवासी परिवार 

सर्दी, खांसी, बुखार से लेकर अन्य बीमारियों के ईलाज के लिये आदिवासियों को छत्तीसगढ़ की सीमा पार कर महाराष्ट्र के दर्रेकसा तक 18 किमी का कठिन सफर तय करना पड़ता है.

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कटेमा के अधिकतर आदिवासियों के पास सायकल तक नहीं है. गांव में सिर्फ 2 लोगों के पास ही मोटर सायकल है. हेल्थ इमरजेंसी आने पर अधिकतर आदिवासी परिवार अपने परिजनों को ईलाज के लिए खाट या साईकल से महाराष्ट्र के दर्रेकसा अस्पताल तक लेकर जाते हैं.

बिजली के अभाव में जिंदगी गुजारने मजबूर हैं कटेमा के आदिवासी

गांव-गांव में बिजली पहुंचाने की सरकार की योजना भले ही कागज पर पूरी होती दिख रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है. आज भी कई ऐसे गांव हैं, जहां लोग बिजली के लिए तरस रहे हैं. ग्राम कटेमा भी उन बिजलीविहीन गांव में शामिल है, जहाँ आज तक बिजली नहीं पहुंची है.

कटेमा की आदिवासी महिलाएं
पेयजल की समस्या से जूझ रहे कटेमा के ग्रामीण 

सरकार तीन साल पहले कटेमा के आदिवासियों को सोलर ऊर्जा के माध्यम से बिजली मुहैया कराने इनके घरों में सोलर उपकरण लगा कर भूल गई है. ग्रामीण शिवराम परते ने बताया कि शुरूवात में इसका फायदा मिला भी लेकिन इसके बाद अधिकतर घरों के सोलर उपकरण या तो पूरी तरह खराब हो गए हैं या ठीक से काम नहीं कर रहे.

शिक्षा से वंचित हो रहे आदिवासी बच्चे

कटेमा के आदिवासी बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित हो रहे है. यहाँ के आदिवासी बच्चे प्राथमिक शाला में दाखिला लेकर बमुश्किल कक्षा पांचवीं तक की पढ़ाई कर पाते है. ग्रामीण जेठू टेकाम ने बताया कि हमारे गांव में किसी ने पांचवीं से आगे की पढ़ाई नहीं की है.

कटेमा का स्कूल
कटेमा का स्कूल  

हम अपने बच्चों को पांचवीं के बाद भी पढ़ाना चाहते हैं लेकिन आगे की पढ़ाई के लिये बच्चों को जंगल के रास्ते दूसरे गांव भेजने का जोखिम हम नहीं उठा सकते. जेठू आगे बताते हैं कि दूसरे गांव तक जाने के लिये सुलभ मार्ग नहीं होने के कारण हमारे गांव के बच्चे पांचवीं के बाद की पढ़ाई नहीं करते. तमाम प्रकार की परेशानियों को बताते हुये जेठू ने अचानक उत्साहित लहज़े में बताया कि इन विपरीत परिस्थितियों बावजूद हमारे गांव की दो लड़कियां महाराष्ट्र के पिपरिया में हॉस्टल में रहकर कक्षा दसवीं की पढ़ाई कर रही हैं. हमारे गांव में इससे पहले किसी ने दसवीं तक की पढ़ाई नहीं की है.

ईलाज से लेकर मतदान तक, हर काम लिए अलग-अलग गांव

कटेमा के ग्रामीणों को किसी भी काम के लिए छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के 10 गांव के बीच चक्कर काटने की मजबूरी बनी रहती हैं. ग्रामीण केमलाल कुरसेंगे ने बताया कि गांव के लोगों को सरकारी राशन ग्राम लछना में मिलता है. बैंक संबंधी काम के लिए मुढ़ीपार जाना पड़ता है. सरकारी खाद-बीज गातापार से लेते हैं. पंचायत चुनाव में वोट डालने लछना जाते है.

कटेमा के ग्रामीण
कटेमा के ग्रामीण 

विधान सभा और लोकसभा चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग करने घाघरा जाते है. इसके अलावा ग्रामीण दैनिक जरूरत के सामानों के लिए महाराष्ट्र के गोंदिया जिले के मुरकुडीह, दलदलकुई, धनेगांव और ईलाज व अन्य जरूरतों के लिए दर्रेकसा तक पैदल ही जाते हैं. इस दौरान जंगली हिंसक पशुओं से आमना-सामना इन आदिवासियों के लिये कोई नई बात नहीं है. आदिवासियों की इस समस्या को भी जिम्मेदारों ने आज तक नजरअंदाज ही किया है.

आदिवासियों की पहुँच से दूर सरकारी दफ्तर, नहीं मिल रहा योजनाओं का लाभ ?

सरकारी दफ्तर तक सुलभ मार्ग नहीं होने के कारण आदिवासी परिवार सरकारी दफ्तर तक नहीं पहुँच पाते. इस वजह से भी ग्रामीण सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हो रहे हैं. ग्रामीण जेठू टेकाम, केमलाल कुरसेंगे, शिवराम परते, रामसिंह ने बताया हमारे गांव से ग्राम पंचायत, बैंक, राशन दुकान, तहसील, सहकारी बैंक व दूसरे दफ्तर 60 किमी के अंदर अलग-अलग दिशा में है.

रधानमंत्री आवास योजना का नहीं मिला लाभ
प्रधानमंत्री आवास योजना का नहीं मिला लाभ 

सरकारी योजना के आवेदन वगैरह के लिए लंबी दूरी तक पैदल सफर कर दफ्तरों के चक्कर लगाना पड़ता है. सरकारी दफ्तर तक पहुंच भी गए तो सरकारी मुलाजिमों के नियम-कानून की बात हमारे पल्ले नहीं पड़ती. गांव में कोई नेता या अफसर भी नहीं आते. बातचीत में आगे बताया कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गांव में आज तक किसी का पक्का मकान नहीं बना है. केंद्र और राज्य सरकार की दूसरी योजनाओं का भी लाभ हमारे गांव के लोगों को नहीं मिल पा रहा है.

कटेमा मार्ग पैदल चलने लायक भी नहीं !

अंदुरुनी इलाकों में बेहतर कनेक्टिविटी और सुदूर ग्रामीण अंचलों को मुख्य मार्गों से जोड़े जाने के लिए बीते चार साल से बन रही ग्राम लछना से कटेमा तक सड़क निर्माण कार्य अब भी अधूरा है. जिसके कारण कटेमा मार्ग स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई है.

कटेमा की खस्ताहाल कच्चा मार्ग
कटेमा की खस्ताहाल कच्चा मार्ग 

सड़क निर्माण में हो रही लेटलतीफी के कारण शासन की योजनाएं ग्रामीणों तक नहीं पहुंच रही है. सड़क के अभाव में कटेमा के आदिवासियों को चिकित्सा, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है. कटेमा के आदिवासियों को जिंदा रहने रोज कठिन संघर्ष करना पड़ता है. पता नहीं सरकार की नज़र और विकास की किरण कटेमा तक पहुँचेगी भी या नहीं ?

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